धरती कब से रही तरस
ऐ बदल अब तो बरस

तन आकुल है ,मन व्याकुल है
सारा जग-जीवन शोकाकूल है
तुम्हारी बूंदों का इंतज़ार पल-पल
आओ-आओ बरसो ओ मेघदल
झुलस गए हैं पेड़ -पौधे
कुम्हला गए हैं फूल-पत्तें
सूख गए सारे नदी- तालाबें
गर्म-गर्म लू उड़ाए धुलें
मेढ़क टर्राने को हैं बेताब
मोर नाचने को हैं तैयार
पेड़ झुमने को ,कोयल कूकने को
चहचहाने को हर पंछी बेक़रार
प्यासी जलती धरती की सुन अरज़
ऐ बदल अब तो बरस








