रविवार, 17 जून 2018

मंदिरों और मस्जिदों की उल्झनों में, न खुद को उलझाओ दोस्तों

उल्झनें हैं ज़माने में और भी,कभी उनको भी तो सुलझाओ दोस्तों

जगमगा रहे, झिलमिला रहे, लग रहे प्यारे-प्यारे सारे नज़ारे
ज़मीनी हक़ीक़त है क्या,ज़रा इन हुक्मरानों को बतलाओ दोस्तों

खाने को रोटी,पीने को पानी,जीनेक हक़ सबको मिला नही
और करते हैं आसमान की बातें,कोई तो इनको आइना दिखलाओ दोस्तों

फर्क करते देखा कभी क्या,हवा,बारिश,रोशनी या चाँदनी को
फिर क्यूँ हैं हम तुम दूर-दूर,गले से लग जाओ आओ-आओ दोस्तों

तोड़ दो जाँत-पाँत,मिटा दो ऊँच-नीच,मिला दो राम से रहीम को
मिलके गले सारा दर्द बाँट लो,यहीं पे स्वर्ग और जन्नत बनवालो दोस्तों


                                                  ---    राजकांत