बुधवार, 30 सितंबर 2020

PEN

न पक्ष न विपक्ष किसी का भी डर है

मेरी स्याही में है दम मेरी कलम निडर है

मैंने पढ़ा है Pen is mighter than the sword

So through my words ,I wanna change the world


तेरे -मेरे दुःख, दर्द ,संताप ,गम

बढ़ते ही जाते क्यों होते नहीं कम

कभी बाढ़ में बह जाते घर, खेत ,खलिहान

कभी सूखे की मार ,ले लेती है जान

रोज़गर नहीं ,शिक्षा नहीं, स्वास्थ्य का बेड़ा गर्क है

ओ ऊपरवाले क्यों पडता नहीं तुझको कोई फ़र्क है

राजभवन से ज़रा निकलो अपने अपने

सुन लो बेचारी जनता की हाहाकार

धिक्कार धिक्कार धिक्कार

तुझको धिक्कार मेरे सरकार


शहर शहर भटके हम दर बदर

न कोई इज़्जत न कोई क़दर

पीते अपमान का घूंट खाते गाली गलौज

घटती ये दुर्घटना संग हमारे रोज़ रोज़

अपने गांव अपने शहर अपने राज्य में

हमको काम दो हमको काम दो

रोटी कपड़ा और मकान दो

संविधान की मोटी किताब में, कहां है हमारा अधिकार ?

धिक्कार धिक्कार धिक्कार

तुझको धिक्कार मेरे सरकार



                                      राजकांत




दिल्ली का दंगा

मत पूछो कितने हिन्दू मरे
मत पूछो कितने मुस्लिम मरे
जो भी मरे , जहां भी मरे
इंसानियत मरी, इंसान मरे

भाई ने भाई का घर लूटा
भाई ने भाई के घर आग लगाया
भाई ने भाई का गला  काटा
भाई ने भाई का ख़ून पीया

पछाड़ खा गिर रही वो पत्नी किसकी
दहाड़ मार रो रही वो बहन है किसकी
छाती अपना पीट रही ये मां है किसकी
बिलख बिलख आ रहीं ये आवाज़ें किसकी

फ़िर राजनीति ने नाचा नाच नंगा
फ़िर हो गयी गुमराह भोली जनता
फ़िर नफ़रत का ऐसा बीज बोया
फ़िर करवा के ही छोड़ा दंगा

मोदी-शाह, सोनिया- राहुल और केजरीवाल
सत्ता और विपक्ष दोनों ही हैं जिम्मेदार
और कितने दंगे कब तक होंगे
कर रही जनता अब सीधा सवाल


                                 -----   राजकांत

रविवार, 17 जून 2018

मंदिरों और मस्जिदों की उल्झनों में, न खुद को उलझाओ दोस्तों

उल्झनें हैं ज़माने में और भी,कभी उनको भी तो सुलझाओ दोस्तों

जगमगा रहे, झिलमिला रहे, लग रहे प्यारे-प्यारे सारे नज़ारे
ज़मीनी हक़ीक़त है क्या,ज़रा इन हुक्मरानों को बतलाओ दोस्तों

खाने को रोटी,पीने को पानी,जीनेक हक़ सबको मिला नही
और करते हैं आसमान की बातें,कोई तो इनको आइना दिखलाओ दोस्तों

फर्क करते देखा कभी क्या,हवा,बारिश,रोशनी या चाँदनी को
फिर क्यूँ हैं हम तुम दूर-दूर,गले से लग जाओ आओ-आओ दोस्तों

तोड़ दो जाँत-पाँत,मिटा दो ऊँच-नीच,मिला दो राम से रहीम को
मिलके गले सारा दर्द बाँट लो,यहीं पे स्वर्ग और जन्नत बनवालो दोस्तों


                                                  ---    राजकांत

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

गज़ल

                               गज़ल

मंदिरों और मस्जिदों की उलझनों में ,न उलझो दोस्तों!

उलझनेंऔर भी हैं कई,कभी उनको भी तो सुलझाओ दोस्तों!

जगमगा रहे, झिलमिला रहे, लग रहे प्यारे-प्यारे सारे नज़ारे!

गौर से देखो, हक़ीक़त है क्या, आँखों से रंगीन चश्मा उताड़ो दोस्तों!

खाने को रोटी नही,पीने को पानी नहीं,जीने का हक़
सबको मिला नहीं!

और करते हो आसमान की बातें,पाँव ज़मीं पे बिन टिकाये दोस्तों!


फर्क करते देखा नहीं कभी,हवा,बारिष,रोशनी और चाँदनी को!

एक-सा बनाया गया है हमसब को, तो आओ हर फर्क को मिटा दो दोस्तों!

तोड़ दो जाँत-पाँत,मिटा दो ऊँच-नीच को,मिला दो राम से रहीम को!

गले मिलके सारा दर्द बाँट लो,यहीं पे स्वर्ग और जन्नत बना लो दोस्तों!



                                  ---राजकांत


मंगलवार, 30 जनवरी 2018

आओ सबसे प्रेम करें !

               आओ सबसे प्रेम करें !


आओ-आओ हाथ मिलायें
आओ-आओ कदम बढायें
नई चेतना मन में जगायें
आओ एकाकार हम हो जायें
               आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें !

अन्तर्मन को विकसित कर लें
जागृत निर्मल उज्ज्वल कर लें
तन मन औ जीवन को सुंदर कर लें
अपना-पराया सबका मंगल कर लें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!

गिरे हुओं को आओ गले लगायें
भूले-भटकों को सही राह दिखायें
अज्ञान के दल-दल से सबको निकालें
प्रबुद्ध उच्च शिखर पर सबको पहुँचायें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!

सुख शांति समृद्धि और सफलता
आओ फिर से इनका आविष्कार करें
जन-जन सरल सहज सुबोध प्रबल बनें
आओ नवयुग का हम नवनिर्माण करें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!


                                                         --- राजकांत


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

जीवन का महागान


जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

दशों दिशओं में जब भय व्याप्त हो जायेगा
धरती से अम्बर तक गहन अंधकार छा जायेगा
सब विनिष्ट और विध्वंश करने को
जब काल प्रबल हो जायेगा
मैं नवजीवन के नवनिर्माण का नवराग गाऊँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

अन्याय को मिलेगा जब खुला समर्थन
जब होगा चारों ओर हिंसा का तांडव नर्तन
असत्य का उत्थान सत्य का पतन
हाहाकार करेगा जब हर व्यथित मन
मैं मन-मन में नया आश जगाउँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

जब तक न राजनीति होगी निर्विकार
अंतिम नागरिक को न मिलेगा पूर्ण अधिकार
समाप्त न होगा सत्ता का घोर अपराध
स्वाहा न होगा जब तक भ्रष्टाचार
मैं तब-तब बारंबार यही प्रश्न उछालूँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा


                                     ---राजकांत

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

तू चल


                  तू चल


तू चल - तू चल
अरमान तेरे अंदर रहा मचल,तू चल
है ख्वाब बरसों से रहा कोई पल,तू चल
बेझिझक, बेहिचक ,बेफिक्र,तू चल
राहों में मच जाये हलचल ,तु चल

स्वयं   से   तू   कर   के   युद्ध
अपनी   गलतियों   से     क्रुध
तपा के स्वयं को कर  ले  शुद्ध
बनते-बनते कोई बनता है बुद्ध
तू चल- तू चल

है डगर कठिन फिर भी तू चल
है छल प्रपंच क कहर फिर भी तू चल
बिन डरे, बिन रुके, बिन थके, तू चल
चलते-चलते मिलती है मंज़िल तू चल
तू चल-तू चल


                               ---राजकांत