मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दर्पण

 

 

दर्पण हम रोज देखते हैं 

 

रूप अपना निहारते हैं

 

 फिर उसको सवारते हैं

 

और उसपे इठलाते हैं

 

 

 

पर क्या कभी झाँका है-

 

मन के दर्पण में 

 

कि कितनी धूल पड़ी है 

 

कि कितने दाग -धब्बे हैं 

 

                                                                                        ---    रजकांत क्रांति 

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

इंक़लाब जिंदाबाद

होशियार ख़बरदार 

हो जा रे हो जा तू तैयार 

करना है हर जुल्म का फर्दाफास 

इंक़लाब  जिंदाबाद 

जिंदाबाद-जिंदाबाद 

इंक़लाब जिंदाबाद 

 

मन-मन में शोला भड़कने दे 

नस-नस में चिंगारी छिटकने दे 

हर सर पे कफ़न बंधने दे 

 सरफरोशी की तमन्ना जगने  दे 

अब न सहेंगे अत्याचार 

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद 

 

 

सरकार भ्रष्ट है जनता त्रस्त है 

प्रजात्रंत ये अस्त -व्यस्त है 

चलती है अफसरों की ललफितेशाही 

मंत्री-संत्री मिल करते खूब कमाई 

अब न सहेंगे अत्याचार

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद

 

कभी बाढ़ कभी सूखा 

कभी प्यासा कभी भूखा 

कभी भाई-भाई का दंगा 

कभी मंहगाई नाचे नाच नंगा 

और इसपे  भी होती राजनीति 

हर नेता सेंके अपनी रोटी 

अब न सहेंगे अत्याचार

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद






                                          राजकांत 'क्रांति '

 

गुरुवार, 20 जून 2013

एक ख्वाब हंसी है आँखों में


एक ख्वाब हंसी है आँखों में
 
एक मीठी खुश्बू सांसों में
 
धड़कन -धड़कन राग है
 
सुंदर सुरीला साज़ है
 
जी रहा हूँ बस इसके सहारे
 
कुछ और नहीं मेरे जीवन में



कुछ रंग चुराऊं फूलों से
 
कोई धुन सुनूँ  मैं भवरों से
 
कभी मोती मांगूँ सागर से
 
कुछ बूंदें चाहूँ बदल से
 
और इनसे से बुनूँ मैं गीत नए-नए
 
 

 
टीम-टीम  टीम-टीम टिमटिमाते तारे
 
जग-मग  जग-मग जगमगाते सारे
गुन -गुन   गुन -गुन   गुनगुनाते

इन्हें  सुनूँ और इनको सुनाऊं

रात  भर मैं गीत प्यारे-प्यारे 



                                                                       ---राजकांत 'क्रांति'
   






  

मंगलवार, 28 मई 2013

ऐ बदल अब तो बरस

धरती कब से रही तरस
 
ऐ बदल अब तो बरस
 
 

 
तन आकुल है ,मन व्याकुल है
 
सारा जग-जीवन शोकाकूल है
 
तुम्हारी बूंदों का इंतज़ार पल-पल
 
आओ-आओ बरसो  ओ मेघदल
 
 
 
 झुलस गए हैं पेड़ -पौधे
 
कुम्हला गए हैं फूल-पत्तें
 
सूख गए सारे नदी- तालाबें
 
गर्म-गर्म लू उड़ाए धुलें
 
 
 
मेढ़क टर्राने को हैं बेताब
 
मोर नाचने को हैं तैयार
 
पेड़ झुमने को ,कोयल कूकने को
 
चहचहाने को हर पंछी बेक़रार
 
 
 
प्यासी जलती धरती की सुन अरज़
 
ऐ बदल अब तो बरस
 
 
     
                                                                                                                 
 

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

देखो आया वर्ष नया





 
 
नई  राहें  हैं खुली-खुली 
नई मंजिले हैं धुली -धुली 
सिंदूरी सूरज मुस्कुरा  रहा 
देखो आया वर्ष नया 


नई हवा बह रही है 
नई  रोशनी छा  रही है 
सागर की लहरें बोल रहीं है लहरा -लहरा 
देखो  आया वर्ष  नया 


नई  चाँदनी  छिटक रही है 
नई रागनी गूँज रही है 
गा रहा है गीत नया दिशा-दिशा 
देखो आया वर्ष नया 




नई -नई बातें 
नये -नये सपनें 
समय का सारथी तुम्हे पुकार  रहा 
देखो आया वर्ष नया 




                                                             -राजकांत  क्रांति -