क्रांति
POEMS SONGS
मंगलवार, 5 नवंबर 2013
दर्पण
दर्पण हम रोज देखते हैं
रूप अपना निहारते हैं
फिर उसको सवारते हैं
और उसपे इठलाते हैं
पर क्या कभी झाँका है-
मन के दर्पण में
कि कितनी धूल पड़ी है
कि कितने दाग -धब्बे हैं
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रजकांत क्रांति
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