मंगलवार, 30 जनवरी 2018

आओ सबसे प्रेम करें !

               आओ सबसे प्रेम करें !


आओ-आओ हाथ मिलायें
आओ-आओ कदम बढायें
नई चेतना मन में जगायें
आओ एकाकार हम हो जायें
               आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें !

अन्तर्मन को विकसित कर लें
जागृत निर्मल उज्ज्वल कर लें
तन मन औ जीवन को सुंदर कर लें
अपना-पराया सबका मंगल कर लें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!

गिरे हुओं को आओ गले लगायें
भूले-भटकों को सही राह दिखायें
अज्ञान के दल-दल से सबको निकालें
प्रबुद्ध उच्च शिखर पर सबको पहुँचायें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!

सुख शांति समृद्धि और सफलता
आओ फिर से इनका आविष्कार करें
जन-जन सरल सहज सुबोध प्रबल बनें
आओ नवयुग का हम नवनिर्माण करें
                आओ सबसे प्रेम करें-आओ सबसे प्रेम करें!


                                                         --- राजकांत


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

जीवन का महागान


जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

दशों दिशओं में जब भय व्याप्त हो जायेगा
धरती से अम्बर तक गहन अंधकार छा जायेगा
सब विनिष्ट और विध्वंश करने को
जब काल प्रबल हो जायेगा
मैं नवजीवन के नवनिर्माण का नवराग गाऊँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

अन्याय को मिलेगा जब खुला समर्थन
जब होगा चारों ओर हिंसा का तांडव नर्तन
असत्य का उत्थान सत्य का पतन
हाहाकार करेगा जब हर व्यथित मन
मैं मन-मन में नया आश जगाउँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा

जब तक न राजनीति होगी निर्विकार
अंतिम नागरिक को न मिलेगा पूर्ण अधिकार
समाप्त न होगा सत्ता का घोर अपराध
स्वाहा न होगा जब तक भ्रष्टाचार
मैं तब-तब बारंबार यही प्रश्न उछालूँगा

जब-जब मृत्यु का महासंगीत बजेगा
मैं तब-तब जीवन का महागान सुनाऊँगा


                                     ---राजकांत

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

तू चल


                  तू चल


तू चल - तू चल
अरमान तेरे अंदर रहा मचल,तू चल
है ख्वाब बरसों से रहा कोई पल,तू चल
बेझिझक, बेहिचक ,बेफिक्र,तू चल
राहों में मच जाये हलचल ,तु चल

स्वयं   से   तू   कर   के   युद्ध
अपनी   गलतियों   से     क्रुध
तपा के स्वयं को कर  ले  शुद्ध
बनते-बनते कोई बनता है बुद्ध
तू चल- तू चल

है डगर कठिन फिर भी तू चल
है छल प्रपंच क कहर फिर भी तू चल
बिन डरे, बिन रुके, बिन थके, तू चल
चलते-चलते मिलती है मंज़िल तू चल
तू चल-तू चल


                               ---राजकांत



बुधवार, 24 जनवरी 2018


                               गज़ल


मुझे मेरे दर्दों से निज़ात दिला सकता है कौन

मुझको मुझसे बेहतर दुनिया में समझ सकता है कौन


जिसे भी देखता हूँ कुछ उम्मीद भरी नज़रों से

वही है पुछता तेरा मेरा रिश्ता है क्या तू है कौन


नज़र मिलने से भी पहले नज़र चुरा लेते हैं कुछ लोग

ग़म के कुहासों में अरे छोड़ो नज़र आता है कौन


टूटे हुए को ही तोड़ना है दुनिया का रस्म-ओ-रिवाज़

बुरे वक़्त में सब मुहँ फेर लेते हैं पुछता है कौन


ऐ दिल तू खुद का ही सहारा बन खुद पर कर यकीं

तेरी मदद तेरे सिवा और दूसरा कर सकता है कौन



                                                   ---राजकांत