नीला-नीला अनंत आकाश
बेला संध्या धुंध प्रकाश
मीठे-मीठे कलरव करते
अपनी धुन में खोये-खोये
आ लौट रहे होते हैं जब घोसलों में
रचते-रचते अनोखा आकर -प्रकार
प्यारी-प्यारी पंछियाँ
उड़ते-उड़ते संग में जब झुण्ड में
बड़े अच्छे लगते हैं
धुधिया -धुधिया चाँदनी रात
निस्तब्धता छाई हो जब आस-पास
नदिया के शांत जल-दर्पण में
मंद-मंद मुस्काता जब चाँद है
छोटी-छोटी भोली-भोली
चाँदी -सी चक-मक चक-मक
नन्हीं -नन्हीं मछलियाँ
संग-संग दल बना जब विचरण करते हैं
बड़े अच्छे लगते हैं
---राजकांत 'क्रांति'






कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें