रविवार, 9 दिसंबर 2012

जाग कवि

चंद्र  तेरे  सामने  ठहरेगा  नहीं
तेरा  बाट  जोहे  रवि
जाग-जाग  तू जाग  कवि
 
 
कुछ सो गए  कुछ खो गए
उन्हें  राह दिखाना होगा
कोई  अटक गया कोई भटक गया
उन्हें मंजिल तक पहुँचाना होगा
ग़म उठाना पड़े तुझे तो कोई नई 
 बात नहीं
जाग -जाग  तू जाग कवि
 
 
राहों में गहरे-गहरे गड्ढे हैं
कहीं-कहीं कंकड़ कहीं-कहीं काँटे  हैं
इस दुर्गम पथ को सुगम बनाना होगा
कल पर छोड़ न कोई बात कभी
शुरू हो जा तू बस आज अभी
जाग-जाग तू जाग कवि





 
 
चंद्र  अगर दिखे  नहीं
रवि अगर छुप जाए कहीं
खुद मशाल -सा जलने से हिचकिचाना नहीं
जाग -जाग तू जाग कवि 
 
 
 
 
 
                    ---राजकांत  'क्रांति'
 

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