चंद्र तेरे सामने ठहरेगा नहीं
जाग-जाग तू जाग कवि
कुछ सो गए कुछ खो गए
उन्हें राह दिखाना होगा
उन्हें मंजिल तक पहुँचाना होगा
ग़म उठाना पड़े तुझे तो कोई नई
बात नहीं
बात नहीं
जाग -जाग तू जाग कवि
राहों में गहरे-गहरे गड्ढे हैं
कहीं-कहीं कंकड़ कहीं-कहीं काँटे हैं
इस दुर्गम पथ को सुगम बनाना होगा
शुरू हो जा तू बस आज अभी
चंद्र अगर दिखे नहीं
रवि अगर छुप जाए कहीं
जाग -जाग तू जाग कवि
---राजकांत 'क्रांति'






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