शनिवार, 21 जनवरी 2012
वरदान
वरदान
मेरा मन भी बने सबल
मुझ में भी आये बेग प्रबल
आंधियों में रह सकूँ अविचल
बाधाओं से भिर सकूँ हरपल
रुदिवाद की जंजीरों को तोडूँ
अन्धविश्वास की धज्जियाँ उड़ा
सत्य का अन्वेषण करता जाऊं
प्रेम- पथ पर मैं बढता जाऊं
फूल प्रेम का खिला सकूँ हे त्राता
बहार अमन का ला सकूँ विधाता
समझा सकूँ मानव से मानव का नाता
देना हो तो ये वरदान दे दाता
-------राजकांत क्रांति
शुक्रवार, 20 जनवरी 2012
लगन
लेके मन में लगन
की हो सागर से मिलन
पर्बत से उतर
दौड़ी समतल की तरफ
देख कर लम्बी सी डगर
न कोई अगर - मगर
चल पड़ी सरसराती
गर्जन करती हहहाती
चट्टानों से टकरा-टकरा कर
जंगलों में भटक-भटक कर
स्वयं राह अपनी खोज कर
चली जा रही कठिन सफ़र पर
कितनों को दिशा दिखाते
कितनों की प्यास बुझाते
कितनों में आस जागते
कितनों को विश्वास दिलाते
पथ चाहे हो कितना ही दुर्गम
सागर से होगा ही संगम
कौन रोक पायेगा ये मधुर मिलन
मन में जो है सच्ची सी लगन
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