लगन
लेके मन में लगन
की हो सागर से मिलन
पर्बत से उतर
दौड़ी समतल की तरफ
देख कर लम्बी सी डगर
न कोई अगर - मगर
चल पड़ी सरसराती
गर्जन करती हहहाती
चट्टानों से टकरा-टकरा कर
जंगलों में भटक-भटक कर
स्वयं राह अपनी खोज कर
चली जा रही कठिन सफ़र पर
कितनों को दिशा दिखाते
कितनों की प्यास बुझाते
कितनों में आस जागते
कितनों को विश्वास दिलाते
पथ चाहे हो कितना ही दुर्गम
सागर से होगा ही संगम
कौन रोक पायेगा ये मधुर मिलन
मन में जो है सच्ची सी लगन

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