वरदान
मेरा मन भी बने सबल
मुझ में भी आये बेग प्रबल
आंधियों में रह सकूँ अविचल
बाधाओं से भिर सकूँ हरपल
रुदिवाद की जंजीरों को तोडूँ
अन्धविश्वास की धज्जियाँ उड़ा
सत्य का अन्वेषण करता जाऊं
प्रेम- पथ पर मैं बढता जाऊं
फूल प्रेम का खिला सकूँ हे त्राता
बहार अमन का ला सकूँ विधाता
समझा सकूँ मानव से मानव का नाता
देना हो तो ये वरदान दे दाता
-------राजकांत क्रांति
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