शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

प्रेमास्त्र

शक्ति दे हमें शक्ति दे माँ 
विचारों को कर सशक्त ,बुद्धि को धार दे माँ
मेरे छंदों,अलंकारों में भर के प्रेम
मेरी कविता को प्रेमास्त्र बना दे माँ


मिटा के अंतकवाद
देश में फैलाऊं प्रेमवाद
खत्म कर इर्ष्या और द्वेष
मन में भरूँ सबके प्रेम-प्रकाश

धर्म के नाम पर न खून बहे
भाई-भाई से गले मिले
गीता और कुरान को खोल
सबको पढ़ाऊं प्रेम-पाठ

जाँत-पाँत भाषा और क्षेत्रवाद का कर नाश
बरसाऊँ ऐसा प्रेम-बरखा
हर जन-जन का मन भींगें
और अलापे बस प्रेम-राग

सारा भारत प्रेममय हो जाये
ऐसा प्रेमवर दे माँ
मेरे छंदों,अलंकारों में भर के प्रेम
मेरी कविता को प्रेमास्त्र बना दे माँ



                              -- राजकांत 'क्रांति'

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