सर्दी आई -सर्दी आई -सर्दी आई भाई
कम्बल तोशक निकले निकली है रजाई
दिन -रात करते सब आग की सेवकाई
शाल ,दुशाला ओढे -ओढे करते माई-माई
सुबह कुहासे शाम कुहासे बड़ा सताती
रात भर टप-टप -टप ओस टपकती
पछुआ हवा सर-सर -सर प्राण लिए जाती
सूरज देव निकले देख कर पोथी -पतरा
हर कोई बैचैन बड़ा किससे रोये दुखड़ा
थर -थर -थर करते कापें बदन
दन्त करते रहते तांडव नर्तन
सी -सी -सी सिसियाती जिव्हा
गरम होते हथेली रगड़ -रगड़ कर
लोग जैसे उँट के मुँह में जीरा
पला मारा ललाहते फसलों को
गला दिया दलहन के कई पौधों को
बढ़ने न दिया आलू,गोभी,बैगन सीम को
सुन्न कर दिया कई बड़े -बड़े पेड़ों को
झेलें सब प्रकृति के इस अद्भुत लीला को
हर जगह निर्जनता सन्नाटा छाई
मौसम ने देखो कैसी ये चुप्पी साधी
हर मन में आलस का अलख जगाई
सर्दी आई -सर्दी आई -सर्दी आई भाई
---राजकांत 'क्रांति'
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