शुक्रवार, 23 मार्च 2012



घर की छत टूट गई है
मनो किस्मत ही फूट गई है



दिन में धूप
रात में चाँदनी
और बारिष में झर-झर -झर पानी
टपकती रहती है उन टूटे -फूटे जगहों से


कमाने वाला एक है
खानेवाले  चार
बाकि क़सर कर देती है पूरी
महंगाई की मार

 
बाप जीवन से थका -थका चिंतित
अनब्याही बेटी का सोच
बेरोजगार बेटे का बोझ
माँ बेचारी भगवन के आगे झुकती रहती -कुढ़ती रहती



                           ---राजकांत 'क्रांति'

बुधवार, 14 मार्च 2012

गीत मेरे




दीया का बाती बने
उपजाऊ माटी बने
फलता पेड़ बने
बहता पानी बने
गीत मेरे

सर्दी की धूप बने
गर्मी की ठंडी पवन बने
सूखे की बारिश बने
भूखे की रोटी बने
गीत मेरे

सत्य का अन्वेषी बने
झूठ का द्वेषी बने
अहं को चूर करे
दुख  को दूर करे
गीत मेरे

दीन का साथी बने
निर्बल का बल बने
सबल की जीत बने
मन में आनंद भरे
गीत मेरे









                                                 ---राजकांत 'क्रांति'

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मैं ठेलेवाला




ठेलेवाला मैं ठेलेवाला
दुनिया का बोझा ढ़ोता हूँ
जी-जान से श्रम करता हूँ
पर पैर किसी के न पड़ता हूँ

सर्दी-गर्मी हो चाहे बरसात
छुट्टी हो या कोई पर्व त्योहार
सर से लेके तलवे तक
बहता रहता पसीने की धार

आधा पेट तो भर पेट कभी
भाग्य से लड़कर झगड़कर
संग नमक हरी मिर्च
सुखी रोटी खा ही लेता हूँ

घोड़े बेच चादर तान के सोता हूँ
चोर लुटेरों से मैं नहीं डरता हूँ
ईर्ष्या नहीं मन में,सबकी खैर मनाता हूँ
मैं दीन दिनकर से पहले उठ जाता हूँ

नज़र उठा सीना तान के चलता हूँ
घमंड नहीं मेहनत पर गर्व करता हूँ
खून-पसीने की कमाई खाता हूँ
दुःख सहकर भी मस्त रहता हूँ


                                                                      ---राजकांत 'क्रांति'

गुरुवार, 8 मार्च 2012

होली

न कोई काला  न कोई गोरा

हर चेहरा आज रंगीन है

उड़ता गुलाल बरसता रंग

ये मंज़र कितना हसीन है




                                                                                                                       ---क्रांति

बुधवार, 7 मार्च 2012

मैं बेरोज़गार हूँ



मैं सोचता हूँ ,घबराता हूँ
अकेले में बरबराता हूँ
मैं बेकार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ

बिन घूस मिलती नहीं नौकरी
बिन पैसों होता नहीं व्यापार
योग्यता की कोई पुछ नहीं
रुपयों का है सब क़ारोबार
मैं निर्धन अब लाचार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ

भूख अब अपनी कैसे मिटाऊं
डिग्री को बेचूं या डिग्री को खाऊं
परिवार का बोझ कैसे उठाऊं
कौन सा मैं रोज़गार अपनाऊं
पेट भरने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ
मैं बेरोज़गार  हूँ

थी किताबों की दुनियाँ निराली
थी वहाँ कितनी खुशहाली
है यहाँ परस्थिति विस्मयकारी
देख यहाँ की हाहाकारी
नीच कर्म करने पर भी नहीं शर्मशार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ



                                                                           ---राजकांत 'क्रांति'