घर की छत टूट गई है
मनो किस्मत ही फूट गई है
दिन में धूप
रात में चाँदनी
और बारिष में झर-झर -झर पानी
टपकती रहती है उन टूटे -फूटे जगहों से
कमाने वाला एक है
खानेवाले चार
बाकि क़सर कर देती है पूरी
महंगाई की मार
बाप जीवन से थका -थका चिंतित
अनब्याही बेटी का सोच
बेरोजगार बेटे का बोझ
माँ बेचारी भगवन के आगे झुकती रहती -कुढ़ती रहती
---राजकांत 'क्रांति'






