शुक्रवार, 23 मार्च 2012



घर की छत टूट गई है
मनो किस्मत ही फूट गई है



दिन में धूप
रात में चाँदनी
और बारिष में झर-झर -झर पानी
टपकती रहती है उन टूटे -फूटे जगहों से


कमाने वाला एक है
खानेवाले  चार
बाकि क़सर कर देती है पूरी
महंगाई की मार

 
बाप जीवन से थका -थका चिंतित
अनब्याही बेटी का सोच
बेरोजगार बेटे का बोझ
माँ बेचारी भगवन के आगे झुकती रहती -कुढ़ती रहती



                           ---राजकांत 'क्रांति'

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