मैं सोचता हूँ ,घबराता हूँ
अकेले में बरबराता हूँ
मैं बेकार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ
बिन घूस मिलती नहीं नौकरी
बिन पैसों होता नहीं व्यापार
योग्यता की कोई पुछ नहीं
रुपयों का है सब क़ारोबार
मैं निर्धन अब लाचार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ
भूख अब अपनी कैसे मिटाऊं
डिग्री को बेचूं या डिग्री को खाऊं
परिवार का बोझ कैसे उठाऊं
कौन सा मैं रोज़गार अपनाऊं
पेट भरने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ
थी किताबों की दुनियाँ निराली
थी वहाँ कितनी खुशहाली
है यहाँ परस्थिति विस्मयकारी
देख यहाँ की हाहाकारी
नीच कर्म करने पर भी नहीं शर्मशार हूँ
मैं बेरोज़गार हूँ
---राजकांत 'क्रांति'

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