गुरुवार, 12 सितंबर 2013
गुरुवार, 20 जून 2013
एक ख्वाब हंसी है आँखों में
एक मीठी खुश्बू सांसों में
धड़कन -धड़कन राग है
सुंदर सुरीला साज़ है
जी रहा हूँ बस इसके सहारे
कुछ और नहीं मेरे जीवन में
कुछ रंग चुराऊं फूलों से
कोई धुन सुनूँ मैं भवरों से
कभी मोती मांगूँ सागर से
कुछ बूंदें चाहूँ बदल से
और इनसे से बुनूँ मैं गीत नए-नए
जग-मग जग-मग जगमगाते सारे
गुन -गुन गुन -गुन गुनगुनाते
गुन -गुन गुन -गुन गुनगुनाते
मंगलवार, 28 मई 2013
ऐ बदल अब तो बरस
धरती कब से रही तरस
ऐ बदल अब तो बरस

तन आकुल है ,मन व्याकुल है
सारा जग-जीवन शोकाकूल है
तुम्हारी बूंदों का इंतज़ार पल-पल
आओ-आओ बरसो ओ मेघदल
झुलस गए हैं पेड़ -पौधे
कुम्हला गए हैं फूल-पत्तें
सूख गए सारे नदी- तालाबें
गर्म-गर्म लू उड़ाए धुलें
मेढ़क टर्राने को हैं बेताब
मोर नाचने को हैं तैयार
पेड़ झुमने को ,कोयल कूकने को
चहचहाने को हर पंछी बेक़रार
प्यासी जलती धरती की सुन अरज़
ऐ बदल अब तो बरस
मंगलवार, 1 जनवरी 2013
देखो आया वर्ष नया

नई राहें हैं खुली-खुली नई मंजिले हैं धुली -धुली
सिंदूरी सूरज मुस्कुरा रहा
देखो आया वर्ष नया
नई हवा बह रही है
नई रोशनी छा रही है
सागर की लहरें बोल रहीं है लहरा -लहरा
देखो आया वर्ष नया
नई चाँदनी छिटक रही है नई रागनी गूँज रही है
गा रहा है गीत नया दिशा-दिशा
देखो आया वर्ष नया
नई -नई बातें नये -नये सपनें
समय का सारथी तुम्हे पुकार रहा
देखो आया वर्ष नया
-राजकांत क्रांति -
रविवार, 9 दिसंबर 2012
सम्हल जाओ ओ सत्तावालों
सम्हल जाओ ओ सत्तावालों
तुम्हारे प्रति जन-जन के मन में
दिन दोगुना रात चौगुना
बढ़ रहा है घृणा और द्वेष
इससे न रुकी है न रुकेगी
जनता का आक्रोश
अत्याचार होगा जब-जब
विद्रोह होगा तब-तब
जब तक इनका हिस्सा लूटोगे खाओगे
बेईमान, लुटेरे, चोर कहलाओगे
जाता के प्रतिनिधि हो
जनता से कतराते हो
शायद ये भूल गए हो
की शासक नहीं तुम सेवक हो
जिन्होंने तुम्हें सर पे उठाया
उन्हें तुम पाँव से रोंदते हो
याद रखो जो जनता तुम्हें सिंहासन पर बिठा सकती है
वही जनता तुम्हें धूल में भी मिला सकती है 
---राजकांत 'क्रांति'
उड़ जा रे पंछी पंख पसारे
उड़ जा -उड़ जा
स्वप्न नए-नए नयनों में सजाये
उड़ जा रे पंछी पंख पसारे
अथाह अनंत आकाश
खुली दिशाएँ फैला चहुँ ओर प्रकाश
बड़ा अमूल्य तू ने पाया यौवन
आएगा न बार-बार फिर ये मौसम
छोड़ घोंसला नाप ले गगन
उड़ना ही कर्म तेरा हो जा इसमें मगन
कर ले पूरा अपना हर स्वप्न
माना निष्ठुर है संसार
पग-पग प्राणों का भय अपार
पर कर्म बिन जीवन कैसा
हर मुश्किलों में डटकर
हर संकटों से लड़कर
सपनों को साकार करना ही पड़ेगा
पाया है पंख तो उड़ना ही पड़ेगा
उड़ जा -उड़ जा
स्वप्न नए-नए नयनों में सजाये
उड़ जा रे पंछी पंख पसारे
---राजकांत 'क्रांति '
जाग कवि
चंद्र तेरे सामने ठहरेगा नहीं
जाग-जाग तू जाग कवि
कुछ सो गए कुछ खो गए
उन्हें राह दिखाना होगा
उन्हें मंजिल तक पहुँचाना होगा
ग़म उठाना पड़े तुझे तो कोई नई
बात नहीं
बात नहीं
जाग -जाग तू जाग कवि
राहों में गहरे-गहरे गड्ढे हैं
कहीं-कहीं कंकड़ कहीं-कहीं काँटे हैं
इस दुर्गम पथ को सुगम बनाना होगा
शुरू हो जा तू बस आज अभी
चंद्र अगर दिखे नहीं
रवि अगर छुप जाए कहीं
जाग -जाग तू जाग कवि
---राजकांत 'क्रांति'
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