बुधवार, 24 जनवरी 2018


                               गज़ल


मुझे मेरे दर्दों से निज़ात दिला सकता है कौन

मुझको मुझसे बेहतर दुनिया में समझ सकता है कौन


जिसे भी देखता हूँ कुछ उम्मीद भरी नज़रों से

वही है पुछता तेरा मेरा रिश्ता है क्या तू है कौन


नज़र मिलने से भी पहले नज़र चुरा लेते हैं कुछ लोग

ग़म के कुहासों में अरे छोड़ो नज़र आता है कौन


टूटे हुए को ही तोड़ना है दुनिया का रस्म-ओ-रिवाज़

बुरे वक़्त में सब मुहँ फेर लेते हैं पुछता है कौन


ऐ दिल तू खुद का ही सहारा बन खुद पर कर यकीं

तेरी मदद तेरे सिवा और दूसरा कर सकता है कौन



                                                   ---राजकांत


गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

मेरे आँखों में समंदर...

मेरे आँखों में समंदर

मेरे दिल में तूफान है

मेरी हर कोशिश में जान

मेरी हर ख़्वाहिश में ईमान है

कल उन शिखरों पर मैं भी रहूँगा

भले ये दुनिया आज मुझसे अंजान है

क्योंकि मुझे टूट के भी जो टूटने नहीं देता

 मेरे साथ वही तो मेरा भगवान है


                                ---राजकांत

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

स्वच्छ रहो स्वस्थ्य रहो

 स्वच्छ  रहो   स्वस्थ्य  रहो



स्वच्छ   रहो    स्वस्थ्य   रहो
सुंदर और सरल ये काम करो
खुद   पे  तुम  फ़ख्र   करो
इस भारतभूमि को स्वर्ग करो


कूड़ा- कचड़ा  फेकों  न तुम यहाँ - वहाँ
गंदगी  मत  फैलाओ  तुम  जहाँ -तहाँ
प्रदूषण  है  हम  पे  अभिशाप  बड़ा 
सब  खुल  के  इसका  प्रतिकार  करो 


गली -गली  और  सड़क -सड़क 
गाँव -गाँव   और   शहर -शहर 
जहाँ -जहाँ जाये तेरी - मेरी सबकी  नज़र 
मिलके भाई-भाई सब साफ़ -सफ़ाई करो 


आओ गाँधी जी  का   सपना साकार करें 
कुछ भी  नहीं है मुश्किल जो हम ठान लें 
सब मिलके स्वच्छ भारत का निर्माण करो
सबसे पहले स्वंय पे  ये  उपकार करो  


                                                         ---  राजकांत ' क्रांति '

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दर्पण

 

 

दर्पण हम रोज देखते हैं 

 

रूप अपना निहारते हैं

 

 फिर उसको सवारते हैं

 

और उसपे इठलाते हैं

 

 

 

पर क्या कभी झाँका है-

 

मन के दर्पण में 

 

कि कितनी धूल पड़ी है 

 

कि कितने दाग -धब्बे हैं 

 

                                                                                        ---    रजकांत क्रांति 

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

इंक़लाब जिंदाबाद

होशियार ख़बरदार 

हो जा रे हो जा तू तैयार 

करना है हर जुल्म का फर्दाफास 

इंक़लाब  जिंदाबाद 

जिंदाबाद-जिंदाबाद 

इंक़लाब जिंदाबाद 

 

मन-मन में शोला भड़कने दे 

नस-नस में चिंगारी छिटकने दे 

हर सर पे कफ़न बंधने दे 

 सरफरोशी की तमन्ना जगने  दे 

अब न सहेंगे अत्याचार 

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद 

 

 

सरकार भ्रष्ट है जनता त्रस्त है 

प्रजात्रंत ये अस्त -व्यस्त है 

चलती है अफसरों की ललफितेशाही 

मंत्री-संत्री मिल करते खूब कमाई 

अब न सहेंगे अत्याचार

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद

 

कभी बाढ़ कभी सूखा 

कभी प्यासा कभी भूखा 

कभी भाई-भाई का दंगा 

कभी मंहगाई नाचे नाच नंगा 

और इसपे  भी होती राजनीति 

हर नेता सेंके अपनी रोटी 

अब न सहेंगे अत्याचार

अब करंगे हम प्रहार

इंक़लाब जिंदाबाद






                                          राजकांत 'क्रांति '

 

गुरुवार, 20 जून 2013

एक ख्वाब हंसी है आँखों में


एक ख्वाब हंसी है आँखों में
 
एक मीठी खुश्बू सांसों में
 
धड़कन -धड़कन राग है
 
सुंदर सुरीला साज़ है
 
जी रहा हूँ बस इसके सहारे
 
कुछ और नहीं मेरे जीवन में



कुछ रंग चुराऊं फूलों से
 
कोई धुन सुनूँ  मैं भवरों से
 
कभी मोती मांगूँ सागर से
 
कुछ बूंदें चाहूँ बदल से
 
और इनसे से बुनूँ मैं गीत नए-नए
 
 

 
टीम-टीम  टीम-टीम टिमटिमाते तारे
 
जग-मग  जग-मग जगमगाते सारे
गुन -गुन   गुन -गुन   गुनगुनाते

इन्हें  सुनूँ और इनको सुनाऊं

रात  भर मैं गीत प्यारे-प्यारे 



                                                                       ---राजकांत 'क्रांति'
   






  

मंगलवार, 28 मई 2013

ऐ बदल अब तो बरस

धरती कब से रही तरस
 
ऐ बदल अब तो बरस
 
 

 
तन आकुल है ,मन व्याकुल है
 
सारा जग-जीवन शोकाकूल है
 
तुम्हारी बूंदों का इंतज़ार पल-पल
 
आओ-आओ बरसो  ओ मेघदल
 
 
 
 झुलस गए हैं पेड़ -पौधे
 
कुम्हला गए हैं फूल-पत्तें
 
सूख गए सारे नदी- तालाबें
 
गर्म-गर्म लू उड़ाए धुलें
 
 
 
मेढ़क टर्राने को हैं बेताब
 
मोर नाचने को हैं तैयार
 
पेड़ झुमने को ,कोयल कूकने को
 
चहचहाने को हर पंछी बेक़रार
 
 
 
प्यासी जलती धरती की सुन अरज़
 
ऐ बदल अब तो बरस