बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

युवाशक्ति - महाशक्ति

जाग -जाग युवाशक्ति  जाग
जग- जाग महाशक्ति  जाग

माँ कर रही है घोर अंतर्नाद
ललाट पे  चिंता की रेखाएँ
चक्षु में जल मन में वेदनाएँ
तुम से आस तुम पे ही विश्वास

जाग-जाग युवाशक्ति जाग
जाग-जाग महाशक्ति जाग

धैर्य से पत्थर को दे पिघला
सहनशीलता से सागर को सोख ले
भुजाओं के बल से पर्वतों को उखाड़ फ़ेंक
मन के वेग से आंधियों का रुख बदल  

जाग-जाग युवाशक्ति जाग
जाग-जाग महाशक्ति जाग

तन को तपा के मन को चेता के
करके घोर तपस्या सरस्वती को सिद्ध कर ले
भाग्य की  लकीरों को स्वंय  लिख और मिटा
ब्रह्मा को भी तू  ले अपने बस में कर

जाग-जाग युवाशक्ति जाग
जाग-जाग महाशक्ति जाग

 सत्य पे चल के असत्य मिटा
निति से अनीति प्यार से घृणा को रोक
है अन्धकार तो मशाल जला
करनी है प्रगति तो क्रांतिपथ अपना

जाग-जाग युवाशक्ति जाग
जाग-जाग महाशक्ति जाग

त्याग कर स्वर्ग की इच्छा
धरती को ही स्वर्ग बना ले
अनमोल जवानी की कीमत जान
अपनी शक्ति को पहचान

जाग-जाग युवाशक्ति जाग
जाग-जाग महाशक्ति जाग

                                                                    ---राजकांत 'क्रांति'

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

भूख























आंते बिलबिलाती है
उदर ज्वालामुखी-सी होती है
सर में आग होता है
आँखों में पानी
दिल में हूक उठती है
जब भूख लगाती है


उपदेश भाते नहीं है
नसीहत अच्छे नहीं लगते
मन करता है विद्रोह बार-बार
अन्न का दाना माँगता है तत्काल
धर्म की बातें कोरी लगती है
जब भूख लगती है






                                                                                     ---राजकांत 'क्रांति'

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

बड़े अच्छे लगते हैं

नीला-नीला अनंत आकाश
बेला संध्या धुंध प्रकाश
मीठे-मीठे कलरव करते
अपनी धुन में खोये-खोये
आ लौट रहे होते हैं जब घोसलों में
 रचते-रचते अनोखा आकर -प्रकार
 प्यारी-प्यारी पंछियाँ
उड़ते-उड़ते संग  में जब झुण्ड में
 बड़े अच्छे लगते हैं






धुधिया -धुधिया चाँदनी रात
निस्तब्धता छाई हो जब आस-पास
नदिया के शांत जल-दर्पण में
मंद-मंद मुस्काता जब चाँद है
छोटी-छोटी भोली-भोली
चाँदी -सी चक-मक चक-मक
नन्हीं -नन्हीं मछलियाँ
संग-संग दल बना जब विचरण करते हैं
बड़े अच्छे लगते हैं


                                       ---राजकांत 'क्रांति'

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

चलना ही जीवन है

थक जाना हार है
रुक जाना मौत है
चलना है -चलना है
चलना ही जीवन है

गिरे हुए को हाथ  बढ़ा के
रोते हुए को गले लगा के
साथ में लेके सबको
आगे ही बढ़ते जाना है
चलना है -चलना है
चलना ही जीवन है

बड़ी सच्ची कहानी है
सुख -दुःख आनी जानी है
सुख में ज्यादा इठलाना न
न दुःख से घबराना है
चलना है -चलना है
 चलना ही जीवन है

दोष लांछन से होगा वार
होगी प्रेम की भी बौछार
इन छोटी -मोटी बातों में
न खुद को उलझाना है
चलना है-चलना है
चलना ही जीवन है

आये मुसीबत आने दो
खुल के दो-दो हाथ  करेंगे
सहज से बाज़ी जाने न देंगे
आशा है मजबूत इरादा है
चलना है -चलना है
चलना ही जीवन है


थक जाना हार है
 रुक जाना मौत है
 चलना है -चलना है
चलना ही जीवन है


                                                                                ---राजकांत 'क्रांति'

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

प्रेमास्त्र

शक्ति दे हमें शक्ति दे माँ 
विचारों को कर सशक्त ,बुद्धि को धार दे माँ
मेरे छंदों,अलंकारों में भर के प्रेम
मेरी कविता को प्रेमास्त्र बना दे माँ


मिटा के अंतकवाद
देश में फैलाऊं प्रेमवाद
खत्म कर इर्ष्या और द्वेष
मन में भरूँ सबके प्रेम-प्रकाश

धर्म के नाम पर न खून बहे
भाई-भाई से गले मिले
गीता और कुरान को खोल
सबको पढ़ाऊं प्रेम-पाठ

जाँत-पाँत भाषा और क्षेत्रवाद का कर नाश
बरसाऊँ ऐसा प्रेम-बरखा
हर जन-जन का मन भींगें
और अलापे बस प्रेम-राग

सारा भारत प्रेममय हो जाये
ऐसा प्रेमवर दे माँ
मेरे छंदों,अलंकारों में भर के प्रेम
मेरी कविता को प्रेमास्त्र बना दे माँ



                              -- राजकांत 'क्रांति'

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

एक ही थैली के चट्टे-बट्टे

ये क्षुद्र नेतागण
क्षेत्र ,भाषा ,जात और धर्म के नाम पर
जनता को आपस में
लड़ा रहे हैं -भिड़ा रहे हैं
वोट की राजनीति कर
अपनी सत्ता जैसे-तैसे चला रहें हैं
घोटालों और घूसों से
अपनी जेंबें भर रहें हैं
दिनोंदिन धन कुबेर बन रहें हैं
अपने काले -काले कारनामों को
सादे -सफेद लिबाशों में छुपा रहें हैं
भाई-भतीजेवाद की परम्परा  को
बेहिचक चला रहें हैं -दौड़ा रहें हैं
अलग- अलग दलों में
अलग-अलग नामों से
ये खुद को बाँटे हुए हैं
पर ज़रा गौर से देखो तो आये नज़र
ये सब के सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं


                 --राजकांत 'क्रांति'

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

सर्दी आई

सर्दी आई -सर्दी आई -सर्दी आई  भाई
कम्बल तोशक निकले निकली है रजाई
दिन -रात करते सब आग की सेवकाई
शाल ,दुशाला ओढे -ओढे करते माई-माई

                                                 सुबह कुहासे शाम कुहासे बड़ा सताती
                                                 रात भर टप-टप -टप ओस टपकती
                                                 पछुआ हवा सर-सर -सर प्राण लिए जाती
                                                 सूरज देव निकले देख कर पोथी -पतरा
                                                 हर कोई बैचैन बड़ा किससे रोये दुखड़ा

थर -थर -थर करते कापें बदन
दन्त करते रहते तांडव नर्तन
सी -सी -सी सिसियाती जिव्हा
गरम होते हथेली रगड़ -रगड़ कर
लोग जैसे उँट के मुँह में जीरा

                                                                पला मारा ललाहते फसलों को
                                                          गला दिया दलहन के कई पौधों को
                                                  बढ़ने न दिया आलू,गोभी,बैगन सीम को
                                                      सुन्न कर  दिया कई बड़े -बड़े पेड़ों को
                                                   झेलें सब प्रकृति के इस अद्भुत लीला को  

हर जगह निर्जनता सन्नाटा छाई
मौसम ने देखो कैसी ये चुप्पी साधी
हर मन में आलस का अलख जगाई
सर्दी आई -सर्दी आई -सर्दी आई भाई


                                                                                 ---राजकांत  'क्रांति'