सम्हल जाओ ओ सत्तावालों
तुम्हारे प्रति जन-जन के मन में
दिन दोगुना रात चौगुना
बढ़ रहा है घृणा और द्वेष
इससे न रुकी है न रुकेगी
जनता का आक्रोश
अत्याचार होगा जब-जब
विद्रोह होगा तब-तब
जब तक इनका हिस्सा लूटोगे खाओगे
बेईमान, लुटेरे, चोर कहलाओगे
जाता के प्रतिनिधि हो
जनता से कतराते हो
शायद ये भूल गए हो
की शासक नहीं तुम सेवक हो
जिन्होंने तुम्हें सर पे उठाया
उन्हें तुम पाँव से रोंदते हो
याद रखो जो जनता तुम्हें सिंहासन पर बिठा सकती है
वही जनता तुम्हें धूल में भी मिला सकती है 




































